Speeches

  • आचार्य श्री. नानेश पुरस्कार कार्यक्रम मे दिया गया भाषण
    तारीख :  २० आॅगस्ट २०१०
    ठिकाण :  यशवंतराव चव्हाण आॅडिटोरियम, मुंबई.
    कार्यक्रम :  आचार्य श्री नानेश समता पुरस्कार सोहळा

    उद्योग, रोजगार व स्वयंरोजगार मंत्री राजेंद्र दर्डा का
    आचार्य श्री. नानेश पुरस्कार कार्यक्रम मे दिया गया भाषण

    परम पूज्य आचार्य श्री नानेशजी के चरणों में कोटि-कोटि वन्दन करता हूँ. आदरणीय जैन रत्न एवं सत्कार मूर्ति श्री दीपचन्दजी गार्डी साहब एवं........
    गुरु ही तो माली है, बंजर में फूल खिला देता है,
    गुरु ही तो कान्हा है, अर्जुन को विजय दिला देता है,
    गुरु ही तराश कर पत्थर को हीरा बनाता है हर युग में,
    गुरु खुद जहर पीकर शिष्य को अमृत पिला देता है.
    शौर्य, त्याग, बलिदान एवं दानवीरता की गाथाओं से लिपटी मेवाड़ की हिरण्य, भूमि पर पैदा होने वाले महान बलिदानियों एवं तपस्वियों की श्रृंखला अभी भंग नहीं हुई है, हो भी नहीं सकती क्योंकि यहाँ की फिजाओं में महाराणा प्रताप के भालों की चमक, चेतक के टापों की धमक तथा भामाशाह की दानवीरता आज भी गुंजायमान है. मेवाड़ का दाता गाँव वर्षों से अपने भाग्य पर इठला रहा है क्योंकि पिता श्री मोडीलालजी एवं मातुश्री श्रृंगारा के आंगन में खिले एक फूल ने न मात्र पोकरना कुल को, अपितु अपने सुकृत्यों से समस्त जिन शासन को महकाया. जिन शासन का यह महकता फूल समता विभूति के रूप में आचार्य श्री नानेश के नाम से जन-जन के दिलों में समा गया.
    पूरी दुनिया ही जब बारूद के ढेर पर बैठी हो, नफरत के बादल हर ओर व्योम में मंडरा रहे हों, स्वार्थ की चादर हर मानव अपने बदन पर ओढ़ा हुआ हो, ऐसे में पूरे विश्व को ध्यान व समता के सूत्र प्रदान करने वाले मानव जाति के इस महान उपकारी की गाथा आने वाली हजारों-हजार पीढ़ियों को मार्गदर्शन करती रहेगी. ऐसे परम पूज्य आचार्य श्री नानेशजी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचारों को आत्मसात कर हजारों दीप आज इस जहाँ में मानवता को रोशन कर रहे हैं, लेकिन एक दीप ऐसा भी है जिसने अपना पूरा जीवन ही प्राणिमात्र की सेवा में समर्पित कर दिया.
    सच में ऐसे दीप-चन्द ही होते हैं, जो जीवन की कीमत को पहचान कर स्वयं को मोक्षगामी बना लेते हैं. आपके अन्त:श्रोत से लोकसेवा का फूट रहा निर्झर न जाने इस देश के कितने नर-नारियों की प्यास बुझा रहा है.
    हाँ मैं बात कर रहा हूँ एक ऐसे महामनीषी की, जो श्री दीपचन्दजी गार्डी के नाम से विश्वविख्यात हैं. शिक्षाप्रेमी श्री दीपचन्दजी गार्डी ने अपने जीवनकाल में मां सरस्वती की आराधना करने वाले अनेकानेक आदित्यों को अपनी रोशनी से आलोकित किया है.
    २५ अप्रैल १९१५ के शुभ दिन को एक साधारण परिवार में जन्म लेकर अपनी अदम्य इच्छा-शक्ति, साहस एवं आत्मबल के मजबूत इरादों से देश-विदेश की कई महत्वपूर्ण उपाधियों को आपने अपने झोले में डाला है. मैं सच कह रहा हूँ कि इस देश में सोने के भाव इसीलिए तो बढ़े हैं क्योंकि अनगिनत गोल्ड मेडल श्री दीपचन्दजी गार्डी के झोले में पड़े हैं.
    आडम्बरों से कोसों दूर रहकर, दूसरों के दर्द की नब्ज को पहचानकर आप हर पल मरहम बनकर एक चिकित्सक की भूमिका सदैव निभाते रहे हैं. कोई मुझे अगर यह कहे कि ये स्केल ले लो और हिमालय को नाप लो, कोई मुझे यदि ये कहे कि ये चम्मच ले लो और सागर को उलीच दो, बहुत मुश्किल काम है. बस इतना ही मुश्किल काम है श्री दीपचन्दजी गार्डी को शब्दों में समेटना.
    आदरणीय दीपचन्दजी साहब देवदूत तो हैं ही, महामनीषी भी हैं, राष्टÑदूत भी वे हैं ही, लेकिन इन सबसे ऊपर निर्मल मन के वे ऐसे धनी हैं, जिन्होंने अपने मन मन्दिर में बैठी अपनी आत्मा को परमात्मा बनाकर स्थापित किया है. प्रतिदिन सैकड़ों नहीं, हजारों नहीं, लाखों रुपयों की राशि दान देने की भावना जिस शख्स में रहती है, वो मानवता का धनी फिर मानव न रहकर देवतुल्य बन जाता है.
    परसेवा-परोपकार की सरिता बहाना इस कर्मयोद्धा को बड़ी बखूबी आता है. सेवा के इस फलदार वटवृक्ष की छाया में न जाने कितने दुर्बल जीवन शीतलता का एहसास कर रहे हैं, जिसकी व्याख्या मेरे बूते के बाहर की बात है. 
    विषमताओं के भीषण दावानल से गुजरने वाली भारतीय संस्कृति को विश्व संस्कृति के रूप में पूरे विश्व में स्थापित करने वाले युगनायक स्वामी विवेकानन्दजी को आदर्श मानते हुए इस कर्मयोगी ने अपने भाव संसार को संवेदनशील एवं सुकोमल सूत्रों से बुनकर स्नेह, करुणा, दया, प्रेम, सहयोग, सहिष्णुता, सुदृढ़ता इत्यादि अनमोल रत्नों से अलंकृत किया है, अपने जीवन वृत्त को. सादा जीवन- उच्च विचार की आप अद्भुत मिसाल हंै.
    जाति, धर्म, क्षेत्र एवं भाषा से परे किसी भी अनाथ, असहाय एवं जीवन में संघर्ष करनेवाले हर एक व्यक्ति को देखकर आप द्रवित हो उठते हैं, और हर सम्भव प्रयास कर पल भर में उसके कष्टों को दूर कर देते हैं. भगवान महावीर के सिद्धान्तों को आत्मसात कर जिन शासन के सच्चे सिपहसालार बनकर मानवता के इस मसीहा ने ऐसे कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं, जिनकी व्याख्या करना किसी के लिए दुर्लभ कार्य है.
    विलक्षण बुद्धि के इस धनी का आभामय मुखमण्डल एवं आपके विचारों और कार्यों में एकरूपता का समन्वय आपको और अधिक देदीप्यमान बना देता है. अनगिनत टिमटिमाते नक्षत्रों के बीच जिस प्रकार रजनीश शोभा पाता है, उसी प्रकार श्री दीपचन्दजी गार्डी साहब मानवरूपी नक्षत्रों के बीच शोभायमान हैं. समाजरूपी निहारिका के मध्य देदीप्यमान यह प्रकाश पुंज जिस तरह आम जन-जीवन को प्रकाशित कर रहा है अत: दानवीरता के इस पुरोधा को आचार्य श्री नानेश समता पुरस्कार से अलंकृत करना,   आनेवाली युवा पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय बनेगा.
    पुरुषार्थ सदा जिनके चरणों में निश-दिन वंदन करता है,
    पर्वत विराट भी झुककर जिनका नित अभिनंदन करता है,
    दया, दान, प्रेम की सरिता जो मुक्त करों से बहाते हैं,
    वे जिनशासन के जैन रत्न श्री दीपचन्द गार्डी कहलाते हैं.
    ९४ साल का यह नौजवान अपने आप में विलक्षण तो है ही, परंतु आपका जीवन भी जन-जन के लिए अनुकरणीय है. आप सदैव स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों व मानवता की सेवा आप और कई-कई वर्षों तक करते रहें यही मंगल कामना. मुझे इस मौके पर याद कर, गुरू नानेश का स्मरण कर जीवन धन्य करने का तथा मानवता के पुरोधा दीपचन्दजी गार्डी के दर्शनों का लाभ दिया. अत: आपका आभारी हूँ. धन्यवाद !
    क्या रखा है भला, झूठे सम्मान में, क्या रखा है भला, मन के अभिमान में, छोडो आडम्बरो को और भक्ति करो, जल उठेगा दीप श्रद्धा का तूफान मे.
  • महा एक्स्पो २००३ मे दिया गया भाषण
    तारीख :  १४ डिसेंबर २००३
    ठिकाण :  औरंगाबाद
    कार्यक्रम :  ‘महा एक्सपो- २००३’

    गृहराज्यमंत्री राजेंद्र दर्डा का 
    महा एक्स्पो २००३ मे दिया गया भाषण

    आदरणीय मंच सम्मानित सदन
    देश के वित्त मंत्री जसवंत सिंहजी, माननीय महाराष्टÑ के मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदेजी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदीजी, राज्य के पर्यटन मंत्री जयदत्त क्षीरसागरजी, पर्यटन राज्यमंत्री चंद्रकांत छाजेडजी, खासदार चंद्रकांत खैरेजी, पर्यटन विभाग के संचालक आशिष कुमारजी, संभागीय आयुक्त वी. रमणीजी, जिलाधिकारी वी. राधाजी, महापौर विमल राजपूतजी, एवं सभी सम्माननीय अतिथिगण, सीएमआईए के सभी पदाधिकारी तथा पत्रकार मित्रों,
    मराठवाड़ा में चार साल के अंतर से आरंभ होने वाले औद्योगिक महाकुंभ ‘महा एक्सपो- २००३’ में आप सभी का मैं तहेदिल से स्वागत करता हूं. संतों की धरती के रूप में पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र के ऐतिहासिक शहर औरंगाबाद में नौ साल पहले ‘महा एक्सपो’ का आयोजन आरंभ हुआ था. तब देश ही नहीं, बल्कि विदेशों के औद्योगिक मानचित्र पर भारत के साथ औरंगाबाद का नाम उभर कर सामने आया. कभी एशिया में सबसे तेजी से विकास करने वाले औद्योगिक नगर की ख्याति पाने वाले औरंगाबाद ने सन् १९९८ में दोबारा ‘महा एक्सपो’ का आयोजन कर अपनी ख्याति को और बढ़ा लिया. तब बजाज और वीडियोकॉन ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया. स्कोडा और एंड्रेस-हाउज़र जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे शहर से अपना रिश्ता जोड़ा. इसके बाद अनेक मुकाम आए, जहां औरंगाबाद और समर्थ तथा समृद्ध हुआ.
    महाराष्ट्र में इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर, औरंगाबाद  सोशल  इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास में विश्वास रखने वाला नेतृत्व है. अलग-अलग विचारों के, अलग -अलग धर्म के..... 
    आज हमारे क्षेत्र का सौभाग्य है कि देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने रिलायंस उद्योग समूह के अध्यक्ष मुकेश अंबानी हमारे बीच हैं. रिलायंस को देश में ‘रिलाइबल इंडस्ट्री’ के रूप में पहचान मिली है. अंबानीजी के बारे में कहा जाता है कि ये जिस शहर में जाते हैं, वहां जरूर कुछ न कुछ देकर आते हैं. वैसे भी इन्होंने ‘दुनिया को लोगों की मुट्ठी’ में कर दिया है. अब देखना यह है कि इनसे हमारी मुट्ठी / झोली में क्या आता है?
    मुझे प्रसन्नता है कि इस आयोजन में कृषि को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है, जिससे इस आयोजन को एक अलग विस्तार मिला है.
    अंत में इस आयोजन से जुड़े सभी उद्योगपतियों, व्यापारियों, विभिन्न व्यावसायिक व सामाजिक संगठनों, इंजीनियरों, आर्किटेक्ट, कलाकारों और श्रमिकों को उनके इस सामूहिक परिश्रम के लिए बधाई देता हूं.
    इसके साथ ही मुझे विश्वास है कि इस आयोजन से मराठवाड़ा की जनता अवश्य ही शैक्षणिक व औद्योगिक दृष्टि से लाभान्वित होगी और क्षेत्र की प्रगति के बढ़ते कदम और तेज होंगे.
    ‘‘अगर तुम बदल डालो अपना नजरिया,
    तो हर जुबा पे तुम्हारी ही बात होगी.’’
      
    धन्यवाद.
  • सन्माननीय बाईजी के अमृतमहोत्सव पर विशेष लेख
    २००२
    मा. बाई, अमृतमहोत्सव, यवतमाळ

    ऊर्जा व पर्यटन राज्यमंत्री राजेंद्र दर्डा का 
    सन्माननीय बाईजी के अमृतमहोत्सव पर विशेष लेख

    मां यानी वात्सल्य और समर्पण की भावना से भरा एक व्यक्तित्व. मां यानी इस सृष्टि का वह व्यक्तित्व जो कि इंसान को सही अर्थों में इंसान बनाता है. मेरी मां श्रीमती वीणादेवी दर्डा, जिन्हें मैं ‘बाई’ कहता हूं, एक ऐसी महिला हैं जिनमें बच्चों के प्रति प्यार, बुजुर्गों के प्रति सम्मान, परिवार के प्रति समर्पण और देश के प्रति प्रेम कूट-कूट कर समाया हुआ है. वह स्वयं एक अनुशासित और आत्मबल रखने वाली महिला हैं. 
    आज ‘बाई’ 75 वर्ष की होने जा रही हैं, लेकिन उनके विचारों में हवा के झौंके की तरह ताजगी है. उनकी सोच में पुरानापन नहीं है. उन्होंने वक्त के साथ खुद को बदला है. मुझे याद है कि आज से करीब तीस साल पहले किसी के लिए भी अपने बेटे को सात समुंदर पार भेजना आसान बात नहीं थी, लेकिन बाई ने उस समय ही एक भविष्यदृष्टा की भांति यह देख लिया था कि मेरा बेटा दूर विदेश से पढ़-लिख कर आएगा तो अपने देश में खूब नाम कमाएगा. उन्होंने अपने बेटे हों या पोते किसी पर भी अपनी मनमर्जी थोपने का प्रयास नहीं किया. शादी-ब्याह के निर्णय उन्हें स्वतंत्र रूप से लेने दिए. 
    यूं तो बाई ने बहुत ज्यादा पढ़ाई नहीं की, लेकिन अनेक मामलों में उनकी समझ अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोगों से बेहतर है. उनको हमेशा ही नई-नई चीजों को सीखने का शौक रहा. कभी उन्होंने हम दोनों भाइयों को सूत कातना सिखाया तो कभी गणेशोत्सव धूमधाम से मनाने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने गौंद के सहारे रंगोली से गलीचा (कालीन) तैयार करना सीखा और उसके बाद हमारे गणेशोत्सव में गलीचा तैयार किया. कई बार बाई ने खाने-पीने की चीजें, जो घर के बाहर अच्छी देखीं, वह सीखीं और घर में ही हम लोगों के लिए तैयार कीं. हमारे बाबूजी को मोगरे के फूल बहुत पसंद थे. बाई उनके लिए हर सुबह मोगरे के फूलों का एक कटोरा तैयार कर उनके सामने रखती थीं. उन्हें हर समय परिवार के हर सदस्य की पसंद-नापसंद का ख्याल रहता है. बाई ने धार्मिक आस्था के साथ परिवार में अंधविश्वास या फिर धर्म का आडंबर नहीं आने दिया. अनेक बार ‘आठइयां’ (आठ उपवास) किए मगर धर्म के नाम पर गलत परंपराओं को कभी घर में आने नहीं दिया. 
    हमने बाई का देश प्रेम काफी नजदीक से देखा है. बाई को सेवादल में काम करते देखा है. जब स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सन् 1942 में बाबूजी जेल गए तो उनके मन में देश भक्ति का भाव और मजबूत हुआ. मुझे याद है कि हर साल 15 अगस्त की सुबह हमारे गृहनगर यवतमाल के निवास स्थान ‘पृथ्वीवंदन’ की सबसे ऊपरी मंजिल पर सुबह सात बजे पहुंच कर वह झंडा फहराती थीं. आज भी बहुत कम लोग झंडे को फहराने के लिए उसे बांधने की तकनीक जानते हैं, लेकिन वह सारी तैयारी खुद किया करती थीं. शाम को खुद ही उसे उतारा भी करती थीं. पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को उनके मन में त्यौहार की तरह उत्साह रहता था. आज के माहौल में बच्चे इन दोनों दिनों को छुट्टी का दिन मानकर घर में बैठ जाया करते हैं, लेकिन हमारी बाई इन दोनों अवसरों पर एक त्यौहार की तरह हम दोनों भाइयों को जैकेट और टोपी पहना कर तैयार करती थीं और हमें पाठशाला भेजा करतीं थीं. 
    बाई ने सारी व्यक्तिगत परेशानियों को मन में रख कर कभी मेहनत से मुंह नहीं मोड़ा. बाबूजी ने जब सन् 1960 में यवतमाल शहर के बाहर दस एकड़ का खेत लिया और उस बंजर जमीन को उद्यान के रूप में परिवर्तित करने की इच्छा व्यक्त की तो बाई ने उस कार्य का भी जिम्मा ले लिया. वह हर सुबह हम बच्चों के लिए खाना बनाकर और अपना टिफिन साथ लेकर पांच किलोमीटर दूर खेत की ओर निकल पड़ती थीं. उन्होंने खेत आने-जाने के लिए कभी भी साधनों की अपेक्षा नहीं की. यदि कोई साधन मिल जाए तो ठीक, नहीं तो वह बगैर किसी शर्म के पैदल ही खेत की ओर निकल जाया करतीं थीं. बाई ने बाबूजी की इच्छा को सही मायने में पूरा किया. आज का यवतमाल का दर्डा उद्यान बाबूजी की दृष्टि और बाई के परिश्रम का परिणाम है.
    हमारी बाई के व्यक्तित्व की एक खासियत यह और है कि वह फिजूलखर्ची में जरा भी विश्वास नहीं रखतीं. उनके पास हर चीज का हिसाब रहता है. मुझे याद है कि बगीचे के फल-सब्जी से लेकर संतरे के खेत और गाय-भैंस के दूध तक के हिसाब में उनकी जानकारी एकदम पक्की रहती थी. उनके पास हर खर्च का पूरा-पूरा लेखा-जोखा रहता था. उन्होंने तंगी के समय भी हम लोगों को अच्छी तरह जीना सिखाया. उन्होंने कपड़ों का अच्छी तरह रखरखाव करना सिखाया. कपड़ों को साफ रखने और इस्तरी कर पहनने की आदत डाली. अक्सर मुझे विजयभैया के दो-तीन साल बाद छोटे हुए कोट और गर्म कपड़े पहना दिए जाते थे. किसी दर्जी को बुलाकर विजयभैया के पुराने गर्म कपड़ों का नाप मेरे हिसाब में बनवा दिया जाता था. बचपन में मुझे वह बात मन ही मन बुरी लगती थी, लेकिन आज वह बहुत अच्छी लगती है. दरअसल वह हमारे बचपन में बाई से मिले संस्कार थे, जिन्होंने हमें हमेशा आपस में मिल-बांटकर रहना, खाना सिखाया. शायद यही हमारे भाइयों के बीच की प्यार की मजबूत कड़ी है. अपनी जिंदगी में बाई ने अपना ज्यादातर समय दूसरों के लिए गुजारा है. पहले उन्होंने बाबूजी के राजनीतिक जीवन और दूसरे कार्यों में साथ दिया. उसके बाद हम   लोगों को बड़ा करने में अपना समय लगाया. फिर हमारी दादी (बाबूजी की मां) की बीमारी में सेवा कर अपना जीवन बिताया. सही देखा जाए तो पारिवारिक जीवन में उन्होंने कभी अपने अस्तित्व की परवाह नहीं की. कभी अपनी तकलीफों के बारे में सोचा तक नहीं. कभी अपनी बीमारियों का हमें अहसास नहीं होने दिया. आज हमारी बाई को उनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा, लेकिन उनका मनोबल कम नहीं हुआ है. उन्होंने पिछले साल ही अपनी बीमारियों को भुलाकर अमेरिका जाकर चिरंजीव देवेंद्र का घर- संसार देखा. यूरोप की सैर की और लौटकर हमें बताया कि शाकाहारी रहते हुए भी विदेशों में रहा जा सकता है. असल में उनका हिमालय की तरह आत्मविश्वास और नाजुक फूलों की तरह कोमल मन उनको हर परेशानी से निकाल देता है, उनके हर क्षण को आनंदित बना देता है. मैं कहना चाहूंगा कि इंसान को भगवान को पाने के लिए काफी जतन करना पड़ता है, तब जाकर कहीं भगवान के दर्शन होते हैं. मगर मैंने अपनी मां (बाई) में ही भगवान की सूरत देखी है. मुझे लगता है कि इससे अलग भगवान की और दूसरी सूरत क्या होगी.
    - राजेंद्र दर्डा
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